सत्व समर्पण
सत्व समर्पण विरह क्या सींचा नही था तिनके तिनके जलते तन उलट पलट कर रहा सेकता भावों से भींगे निज मन को। नीरवता बन नागिन डसती थी यादों की धुधली परछाई इच्छाधारी नाग सा नाचू पर छलने की कला न आई . ताक रहा निस रैन चाँद मैं दे दे श्राप सदा छिपने की ...