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नववर्ष -समर्पण

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  दो फूल नहीं दो  वृक्ष नहीं, कुछ पत्तों का संजोग  नहीं , दो दिल की धड़कन एक बने, दो  धार  मिले एक नदी बने . सुनहरी भोर पूरब की, तुम्हारे होंठो से बिहँसे , धरा प्यार से रोशन हो, रसना से हरदम मधु बरसे . धरती समझे धन्य स्वयं को , सुन तेरे कर्मो की पायल , चौखट की औकात किसी क्या, रोक सके जो रह स्वर्ग का . हर कोई तेरे छवि को निरखे , हर कोई तुमसे प्यार करे , कोई तुमको जुदा न समझे , खिले चमन और शाख  हरे . नई जिंदगी नई उमंगें , नए साल की नई कहानी , द्वारे कड़ी नई साल है, लेकर चन्दन पूजा थाली. प्रातः सुहानी...